Saturday, 9 November 2013


नोटा का सोटा...


चुनाव सुधार के क्रम में कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक मजेदार निर्णय दिया।' नोटा' यानि नन आफ द एवव, हाँ  अगर आप विद्यार्थी रहे होंगे? और यदि कभी परीक्षा में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर दिये होंगे? तो आप इस अस्त्र से अच्छी तरह वाकिफ होंगे, क्योंकि वहाँ विद्यार्थीयों को कनफ्यूज करने के लिये नोटा का इस्तेमाल होता आया है। परंतु चुनावों में इसका प्रयोग उसी तरह का है कि मानों लोकतंत्र की सब्जी का स्वाद बढ़ाने के लिए एक नया मसाला सामने लाया गया हो।
                                                                                                   कल की ही एक घटना है मेरे साथ आई आई एम सी में पढ़ रहे रोहित ने वर्ग में कहा मैं वोट नहीं दूँगा, ये सारे राजनेता एक जैसे हैं। रोहित जैसे कई लाख लोग इस देश में मौजूद हैं। जिनको लगता है-भक वोट देके का होगा, कौनो शेर थोड़े मार लेंगे। और संविधान में जिस तरह से सबको अपनी इच्छा से वोट डालने का अधिकार प्राप्त है उसी तरह अपनी स्वेच्छा से वोट नहीं डालने का भी अधिकार प्राप्त है। अरे महराज रूकिये इन अधिकारों के चक्कर में काने बैंगन से संतोष करना पड़ जाता है। जबकि देश में अच्छे-सुन्दर बैंगन भी मौजूद हैं।
                                                   खैर ये तो एक बात रही, चलिए देखते हैं इ नोटा क्या कर सकता है? ये चुनाव में उम्मीदवारों को नकारने का एक वटन माध्यम है। हाँ इससे उनके हार जीत में तो कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन नोटा का सोटा ज्यादा संख्या में रहा तो राजनैतिक पार्टीयों के पेशानी पर बल अवश्य पड़ेगा। इस देश में पार्टी भूत जनमानस पर हावी रहती है, अक्सर पार्टी के नाम पर जनता जनार्दन -गली टाइप टपोरी से लेकर हाइक्लास टपोरियों को वोट दे देती है। कथित बुद्धिजीवी लोग विरोध करना चाहते हैं परंतु कल तक विरोध दर्ज कराने के लिए प्रजाइडिंग आफिसर को बताना पड़ता था और एक फार्म भरना पड़ता था, पहचान लीक होने पर जान का खतरा। और पुलिस मामू सुरक्षा कार्यो की जगह उपर से नीचे दरबारी में व्यस्त तो किसके भरोसे देशबन्धु जाये वोट डालने, लेकिन नोटा आने के बाद अब ऐसी बात नहीं रहेगी।
                                                                                                                                    और आप सभी तो जानते हैं कि कुछ भी हो जाये लोकतंत्र में जनता को पटाने के लिए ही इतना कर्मकांड होता है। अगर जनता नाराज तो पेट कैसे चलेगा महराज? इसलिए माताओं भाइयों, बहनों, चाचाओं, चाचीयों, दोस्तों, दोस्तीनों सभी से अनुरोध है अगर आप 18 साल के हो गये हैं तो इ वोटवा( वोट) जरूर डालिए, जहाँ मन करे वहाँ डालिए, और त और नहीं मन करे तो भी डालिए अपनी इच्छा अनुसार नोटा पर और सुविधानुसार जैसन कपड़ा रहे घर में वैसन पहन के जाइये, शर्माने का कोई बात नहीं है। तू ही तो मालिक हो जनता , इहेस नु हम कहतनी जेतना लोग मिल के वोट डालव ओतने देश के विकास होई। अब इ त तोहरा पे बा कि तू वोट डाले खातिन लूंगी-गंजी में जइवो की टाइ-कोट में, साइकिल में जइवो या बड़का गाड़ी में। आखिर यही तो उ दिन होता है जहाँ गरीब दास को भी लगता है कि हम सब एक हैं क्या ऊँच, क्या नीच सबका वोट वैल्यू एक..........।

                                                                                                                   विवेकानन्द
                                                                                                                 छात्र:- पत्रकारिता
                                                                                                             आई आई एम सी, नई दिल्ली

Friday, 8 November 2013

एक पत्रकार होने के नाते आज के दौर में आपका ब्लाग लेखन परम आवश्यक है। इसी क्रम में मैंने आज शुरूआत की है। आज सूर्योउपासना के पर्व छठ का पहला अर्घ्य है वहीं मैंने चौपाल में पहला अर्घ्य डाल दिया है। हमेशा एक पाठक सोचता है कि मैं किसी को क्यों पढ़ु ? मैं भी सोचता हूँ.........